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Tuesday, October 13, 2015

जब तक पैदा करता हूँ अनाज
हर कोई करता मुझ  पर  नाज़
मेरे ही कारण करता था हमारा
ये  भारतवर्ष दुनियाँ  पर  राज़

पर नही  बरसते  ये बदरा अब
न जाने कितना सताएगा ये रब
सूखा ही  सूखा चहुंओर है,जाने
दिखेगा  पानी  इन खेतों में कब

ताल नदियाँ सब सूखने लगी हैं
ये साँस भी  अब रुकने लगी हैं
रहती  थी  गर्व से  ऊपर  गर्दन
वो शर्म हय से अब झुकने लगी

साहूकारों   का  सताया हुआ हूँ
दीमको  का  मैं खाया  हुआ  हूँ
चमक  नही रहती इस चेहरे पर
सूखी  आँधी से  नहाया हुआ हूँ

खाद   बीज  अब  मिलते  नही
फूल  खेतों में वो  खिलते  नही
कहाँ गये वो कोयल मोर पपीहे
साथी  मेरे  वो अब दिखते नही

थक चुका  हूँ  काम  कर करके
अपनी हार  अब  मैं मान  लूँगा
लगा  दो  "संजू"  सहारा  थोड़ा 
वर्ना लटककर पेड़ पर जान दूँगा

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