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Saturday, November 21, 2015

सूखे  पड़े रिश्तों के बगीचे
रंग   बिरंगे फूल खिला दो

     बनी है  नफरत की दीवारें
     सबको  अब तुम मिटा दो

बुझती  हुई  आशाओं पर,
उम्मीद  के दिये  जला दो

     न  हो  निराशा   कहीं  भी
     आशा हर कोने में जगा दो

कुछ जलाओ अपने  लिये
कुछऔरों के लियेजला दो

     छोड़ो अँधेरे का दामन सब
     प्रकाश  हर तरफ़ फैला दो

बैरभाव दिल में न हो कहीं
भाईचारा चहुंओर फैला दो

     त्यागो अँधेरी रात तुम अब
     सूर्य की और क़दम बढा दो

त्याग दो सभी नाखूशी संजू
खुशियों के दीप अब जला दो

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