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Sunday, December 27, 2015

कुछ यादें कुछ बातें  कुछ  इरादे पीछे छोड़ चला
जिंदगी का  एक साल और हमसे मुंह मोड़ चला

कुछ हसीन  सपने दिखाकर
कुछ   नये   फूल  खिलाकर
कुछ  अंजानो  से  मिलाकर
कुछ  गहरी   ज़ड़े  हिलाकर
एक अनजाने  से  रास्ते  पर  खुद  वो दौड़ चला

कुछ  कामयाबी   हमें  देकर
कुछ  बदले हमसे  भी लेकर
कुछ ग़म वो ही खुद सहकर
कुछ खुद   तन्हा  सा रहकर
चंद खुशियाँ और ग़म दामन में हमारे जोड़ चला

अलग सा जोश हममें भरके
खूब  अच्छे  से  काम करके
किसी  बला  से  न वो डरके
हमको नेक रास्ते  पर करके
लगे रिश्तों पर ताले जो सबको ही वो तोड़ चला

सब नफ़रतें दिलों से मिटाके
सब   गलतफहमियां  हटाके
दिलों से दिल यूँ ही  मिलाके
फूल  खुशियों  के   खिलाके
करके हमसे  एक खुशनुमा - सा  गठजोड़ चल

कुछ  कलियाँ तो खिल गयी
कुछ  खुशियाँ तो मिल गयी
कुछ बातें तोसमा दिल गयी
कुछ  मंजिलें  तो मिल गयी
"संजू "कामयाबी के लिये  क्यों   वीरां रोड़ चला

कुछ यादें कुछ बातें  कुछ  इरादे पीछे छोड़ चला
जिंदगी का  एक साल और हमसे मुंह मोड़ चला

Thursday, December 17, 2015

ए मेरी  धरती , ए मेरे घर
अब  मुझको  तू  बुला ले
थक  चूका  हूँ बहुत अब
अपने आँचल में सुला ले

आता  है  याद  बहुत  तू
पूरा   ही  दिन  खलता है
मन  तेरे  विरह  में   अब
ये  सारा  दिन  जलता है
थी  जितनी  भी  खताये
सबको  तू  अब भुला ले
थक चुका ..............

नही   लगता अब  सफर
ये अब  पहले सा सुहाना
नही  दिखता  अपनापन
क्यूँ  लगता  सब बेगाना
देदो सजा चाहे कोई तुम
चाहे  पास बैठा रूला ले
थक चुका ...............

दूरियों  का  गड्डा अब तो
होता ही जा रहा है गहरा
चेहरे की इस मुस्कान पर
लग  चुका  है  एक पहरा
तोड़  दो  अब  पहरे सारे
बंधन  सारे  ये  धुला   ले
थक चुका ...............

ढूंढ़ता  ही रहता हूँ हरदम
घर आने का  कोई बहाना
चाहता  रहता   हूँ अब तो
हरपल  तेरे ही पास आना
भेजो  बुलावा कोई जल्दी
कहीं  "संजू "तुझे भुला ले
थक चुका ....................

ए   मेरी  धरती , ए मेरे घर
अब   मुझको   तू  बुला ले
थक   चूका   हूँ बहुत अब
अपने   आँचल में सुला ले

अब तो बता दे जिंदगी
__________________

बता  दें जिंदगी तू, कितना और मुझे भटकाएगी
सताया  है तूने  खूब कितना और अब सताएगी

कितने  तूने  खेले  खेल , छुड़ा  दिये सब अपने
बना बहाना सफलता का , तुड़ा दिये सब सपने
सूखी  होली सूखी दिवाली,सब सूखे लगे लगने
अब तो बता दें हमें , कितना और हमें रुलाएगी
बता दें जिंदगी ................

छूटे  दोस्त , खेल ,रिश्ते और छूट  गया घर बार
नही  था  कोई दोष में,पर करवा दिया तड़ीपार
भुला दिया गाँव मेरा और भुलवा दिया परिवार
दंड दिया खूब कितना वनवास और कटवाएगी
बता दे जिंदगी ...........

हँसाके थोड़ा  सा  मुझको कितना  रूला लिया
करके घर से दूर मुझको, सबसे तूने भुला दिया
देके चंद   खुशियाँ , हजारों गमों से मिला दिया
कब दूर होंगे ग़म ये  और खुशियाँ कब आयेंगी
बता दें जिंदगी ..............

छोड़ के जिद  अपनी, सुलह  अब मुझसे कर ले
हो गया हूँ परेशां  बहुत,अब तो आने मुझे घर दे
भूल जा खताए सब खुश रहने का कोई हुनर दे
कुछ कर संजू  तभी ये जिंदगी खुशियाँ लायेंगी
बता दे जिंदगी .............

बता  दें जिंदगी तू, कितना और मुझे भटकाएगी
सताया  है तूने  खूब कितना और अब सताएगी

बसने  लगी  बस्तियां  अलग, सब  साथ रह जाते  
छोटी - मोटी  मुशीबतों को,मिलकर हम सह जाते

चहुंओर फैलाकर भाईचारा,करते संग  सब गुजारा
बन एक दूजे का प्यारा, प्रेम की दरिया में बह जाते

सब गले लगके  मिलते, बगीचे के फूलों से खिलते
किसी के हिलाने से न हिलते, इकठ्ठे  यहाँ रह जाते

मानवता का पाठ पढाके,नेक रास्ते सबको चलाके
दूसरों  को  अपने साथ चलाके,बढ़ने की कह जाते

नफ़रत   को  मिटाके,अज्ञानता  का  अँधेरा हटाके
शिक्षा  की ज्योत ज़लाके,संजू   अलग सतह पाते

बसने  लगी  बस्तियां  अलग , सब साथ रह जाते  
छोटी -मोटी   मुशीबतों को,मिलकर हम सह जाते

हम तो ठहरे  आज़ाद पंछी
पहुँच जायेंगे अपने आशियाने
यूँ ही शाम  ढलते - ढलते

लक्ष्य ठहरा स्पष्ट हमारा
मिल जायेगी मंजिल हमें
यूँ ही यहाँ वहाँ चलते - चलते

कितनी टकरायेगी हमसे वो
थक जायेंगी सब मुश्किलें
राह में हमारे अड़ते - अड़ते

कितनी रोकेगी ये बाधायें
पार पा जायेंगे सबसे हम
बस यूँ ही हँसते - हँसते

मिलती है नाकामियां उन्हे
जो करते है हर काम
नाकामियों से डरते - डरते

नही है सहारे की कमी यहाँ
न जाने क्यों डरते है हम
विश्वास किसी पर करते - करते

थोड़ा सा क़दम बढ़ाओ
चलो मंजिल की और "संजू "
गले सबके यहाँ लगते - लगते

हम तो ठहरे  आज़ाद पंछी
पहुँच जायेंगे अपने आशियाने
यूँ ही  शाम  ढलते - ढलते

Monday, December 14, 2015

किसी उलझे लेखक की फरियाद कहानी
हुई बहुत तोड़ फोड़ कर आबाद   कहानी

न  जाने कितने लोगों का घर बसाकर ये
प्यार  बढाकर  हुई है खुद ईजाद कहानी

कितनों   के  सपनो  को हवा में  उड़ाकर
उनको करके आई है ऐसा बरबाद कहानी

दिल में  बसे लोगों को दिल  से  भुलाकर
तब जाकर आई है सबको ये याद कहानी

कर  जाती है  घर  दिलों में किसी  के गर
कर देती है अरमानों को  बरबाद कहानी

जिनका लहजा  होता है गर सीधा साधा
उनके लिये होती है खुली किताब कहानी

देता  है सजा वक्त ठोकर मार  - मारकर
उनको  तो  रहती है हरदम  याद कहानी

कितना वक्त का हँसाया / रूलाया होगा
"संजू " जिसने  की   है ये ईजाद कहानी

तब और अब

उसे पसंद था अकेलापन सदा
पर दोस्तों ने कभी अकेला न छोड़ा
आज चाहता है वो साथ सबका
पर हर कोई न जाने क्यों
अकेला ही छोड़ता जा रहा है

रहता था सारा दिन वो उछलता
पर मन उसका रहता था शांत
पर आज जब वो चाहता है शांति
तो न जाने क्यों ये मन उसका
किसी न किसी उधेड़बुन में रहता है

नही पसंद थी उसे घर की चाय
चाहा उसने सदा काफ़ी पीना
किसी बड़े से रेस्टोरेंट में
पर आज उसे याद आती है
वो चाय अकेले बैठे- बैठे
जब काफ़ी पी रहा है रेस्टोरेंट में

तब जल्दी रहती थी उसे
अपने ही दोस्तों को पछाड़कर
सबसे आगे निकलने की
पर आज जब वह निकल चुका है
सबको पीछे छोड़कर तो
याद आ रहे है वो पुराने दोस्त

तब आती थी नींद खराटेदार
पर मन नही करता था सोने को
पर आज जब करता है मन सोने को
तो न जाने ये नींद कहाँ चली गयी
इन कागज के टुकडों की चिंता
उसकी वो नींद छीन ले गयी

"संजू "छोड़ना चाहता था  बचपना
तलाश रहती थी कामयाबी की
पर आज जब मिल गयी है कामयाबी
तो मन रहता है उसका बेचैन
उसी पुराने बचपने को पाने को

Friday, December 4, 2015

चारों   और  पानी  ही पानी
चारों  और  हानि   ही हानि
चारों और अँधेरा ही अँधेरा
हो जाये  अब जल्दी सवेरा
चारों और  फैला  हाहाकार
राहत  उपायों   का इंतजार
मदद को  हर  कोई   तैयार
पर बाधा है मौसम की मार

आशा है  दिल   के कोने में
गंवाना नही हैं आँसु रोने में
कुछ  ही पल बाकी हैं  अब
ये मुशीबतो    कम  होने में
बहुत जल्द होगा यहाँ सवेरा
बीत  जायेंगी ये  अँधेरी रातें
फ़िर खिलखिलायेगी चेन्नई
फ़िर होगी  मस्ती  की  बातें
सब कुछ हो जायेगा सामान्य
सुधर  जायेंगी  सब हालात-ए

Saturday, November 21, 2015

मुस्कराती दिखे   कलियाँ
लहराती  पेड़ों  की  डाली
हर  हरे   भरे खेत यहाँ के
दिखे  चहुंओर   हरियाली

रहते  लोग खुशहाल यहां
सब  मस्ती में नाचते गाते
नही है  यहाँ बैरभाव कोई
गहरे यहां सब  रिश्ते-नाते
जीने  का  अंदाज़ निराला
सबकी अदा यहां  निराली
हरे भरे ....................

है  रंग  बिरंगे  त्यौहार यहां
बैसाखी,संक्राति और तीज
मस्ती  रहती मेलों में  यहां
सावन आता  बड़ा लजीज
रंगो  बिरंगी यहां की  होली
रोशनी दीपों वाली दिवाली
हरे भरे ...................

खाना पीना  शाकाहारी  है
दूध दही छाछ वाला खाना
लस्सी माखन  और मलाई
याद  आये नटखट  कान्हा
अनेक  तरह  पकवानों  से
यहां  सबकी भरती  थाली
हरे भरे ....................

सादगी भरी  लोगो में यहां
पहनावा  है सबका   सादा
यहां आलस्य का नाम नही
काम करें खेतों   में ज्यादा
नही है कमी पानी की यहां
बहती   यहाँ नदियाँ  नाली
हरे भरे .....................

डंका  बजे खिलाड़ियों का
ये  खेल ही  हमारी जान है
ओलम्पिक   हो   एशियाड
इन्ही  से इसकी पहचान है
कर  देते कब्जा मेडलो पर
आये न  कभी हाथ  खाली
हरे भरे ......................

सेना  से हमारा गाढ़ा नाता
हरकोई सैनिक बनना चाहे
नही दिखाते पीठ कभी भी
सदा  देश का गौरव बढाये
मुस्कराते  रहे  लोग "संजू "
हर  चेहरे  पर  दिखे लाली
हरे  भरे हर  खेत  यहाँ  के
दिखे   चहुंओर   हरियाली

आई है मुस्कान येअलग- सी
सालो से उदास इस चेहरे पर
मौका मिला है कितना प्यारा
ये दिवाली  मनायेंगे  घर  पर

खूब जली  चाइनीज लड़िया
दिये मिट्टी के जगेंगे इस बार
होती  रही  जो शांत दिवाली
हल्ले वाली होगी वो इस बार
होगा कितना अलग  नजारा
जायेंगे  रॉकेट लेकर छत पर
मौका मिला है .................

अकेले -अकेले मनाते थे जो
मनायेंगे अब   घरवालों  संग
होगी  कितनी रंगीन दिवाली
जो  हो  चुकी  लगभग बेंरंग
नही   मिलते घर के पकवान
खायेंगे  वो अब जी भर कर
मौका मिला है ................

बचपन वाली यादें   फ़िर से
पटाखे   छोड़कर   लानी  है
गायब  हुई  थी जो खुशियाँ
इस  बहाने  वापिस पानी है
चलेगी  चरखी और  अनार
उठा  लेंगे  आसमां सिर पर
मौका मिला है .............

उठाओ  अब बैग कंधे पर
करो  घर चलने की तैयारी
हुई ही  परेशानियां जितनी
उनको  भुलाने की है बारी
छोडो  सब   काम " संजू "
घर  चलने  की तैयारी कर

मौका मिला है  एक प्यारा
ये दिवाली मनायेंगे घर पर
आई है मुस्कान अलग सी
सालों  से उदास  चेहरे पर

सूखे  पड़े रिश्तों के बगीचे
रंग   बिरंगे फूल खिला दो

     बनी है  नफरत की दीवारें
     सबको  अब तुम मिटा दो

बुझती  हुई  आशाओं पर,
उम्मीद  के दिये  जला दो

     न  हो  निराशा   कहीं  भी
     आशा हर कोने में जगा दो

कुछ जलाओ अपने  लिये
कुछऔरों के लियेजला दो

     छोड़ो अँधेरे का दामन सब
     प्रकाश  हर तरफ़ फैला दो

बैरभाव दिल में न हो कहीं
भाईचारा चहुंओर फैला दो

     त्यागो अँधेरी रात तुम अब
     सूर्य की और क़दम बढा दो

त्याग दो सभी नाखूशी संजू
खुशियों के दीप अब जला दो

बाल दिवस के दो चेहरे

पहला दृश्य  :-
आई एस बी टी  से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की और जाते हुए मैंने कुछ बच्चे देखे जो शायद किसी झुग्गी से सम्बन्ध रखते थे ! एक चौराहे पे बेचारे खेल रहे थे ! शायद  उनके मम्मी पापा काम पर निकल चुके थे और वो बेचारे बाल दिवस से अंजान अपनी ही मस्ती में खोये हुए थे ! पंद्रह - बीस बच्चों में शायद ही कोई ऐसा बच्चा होगा जिसने आधे कपड़े पहने हो अन्यथा सभी लगभग नंगे बदन ही सुबह की ठंड का मजा ले रहे थे !उनके लिये आज का दिन सिर्फ एक छुट्टी था और पूरा दिन खेलने के लिये था !

दूसरा दृश्य :-

जैसे ही ऑटो रेलवे स्टेशन की और मुड़ने वाला था कुछ बच्चे भागे - भागे अपने हाथ फैलायें आये ! उनके माँगने का अंदाज़ तो लगभग सबको पता ही होता है ? आगे फ़िर कुछ बच्चे बाल दिवस मना रहे थे ! कोई अखबार बेच रहा था , कोई भीख माँग रहा था , कोई चाय के बर्तन साफ कर रहा था  तो कोई जूतों को पालिश कर रहा था ! क्या यहीं है  इनका बाल दिवस ???

अब देखना कोई गुलाब लगाकर चाचा बन जयेगा ,, कोई कैलाश सत्यवर्ती बनकर इनके साथ फोटो खिंचवाकर नोबल पुरस्कार ले जायेगा तो कोई स्लमडॉग मिलेनियर फिल्म बनाकर करोड़ों कमाएगा और इन बच्चों का जीवन स्तर इसी तरह  गिरता जायेगा ! वास्तव में धिक्कार है ऐसी व्यवस्था पर !

मरना  होगा पल  पल ऐसे ही इनको
बचाने   कोई   मसीहा  नही  आयेगा
ज्यों ज्यों  बढ़ती  जायेगी उम्र इनकी
जीवन में अँधेरा यूँ ही बढ़ता जायेगा

होश   सम्भालते  ही  अपना  इनको
इसी तरह  रोज़ी - रोटी कमाना होगा
कभी  मिल  जायेगा   खाना   शायद
कभी कभी ऐसे भूखे सो जाना होगा
पूरा  दिन करते रहे  ये  मज़दूरी चाहे
कमाई  इनकी कोई और खा जायेगा
मरना होगा पल - पल ..........

अधनंगा रहे सदा  तन  - बदन इनका
शायद ही पहने ये  कभी  कपड़े मिले
खाते रहे फटकार  लोगो की दिनभर
घर आते इन्हे माँ बाप के झगडे मिले
दुश्मन   बन  जायेगा  बाप ही इनका
हर  दिन  इनको  वो  यूँ  ही सतायेगा
मरना होगा पल - पल .............

खिंचवाकर  दो  चार फोटो संग इनके
शायद  कोई नोबल  पुरस्कार ले जाये
बनाकर  स्लमडॉग  मिलेनियर इन पर
ऑस्कर  अवार्ड  तक कोई जीत लाये
तड़फ़ते  रहेंगे क्या उम्र भर ये ऐसे ही
या फ़िर  कोई मदद को हाथ बढायेगा
मरना होगा पल पल .................

सुनो  ए नेताओ,सुनो ए समाजसेवियों
कुछ  इन  गरीबों  का  भी ख्याल करो
है ये भी  हिस्सा  अपने ही समाज का
रुका हुआ इनका भविष्य बहाल करो
नही छीनो बचपन इनका तुम " संजू "
होकर जवां ये  अपना गौरव बढाएगा

ए मेरी  धरती , ए मेरे घर
अब  मुझको  तू  बुला ले
थक  चूका  हूँ बहुत अब
अपने आँचल में सुला ले

आता  है  याद  बहुत  तू
पूरा   ही  दिन  खलता है
मन  तेरे  विरह  में   अब
ये  सारा  दिन  जलता है
थी  जितनी  भी  खताये
सबको  तू  अब भुला ले
थक चुका ..............

नही   लगता अब  सफर
ये अब  पहले सा सुहाना
नही  दिखता  अपनापन
क्यूँ  लगता  सब बेगाना
देदो सजा चाहे कोई तुम
चाहे  पास बैठा रूला ले
थक चुका ...............

दूरियों  का  गड्डा अब तो
होता ही जा रहा है गहरा
चेहरे की इस मुस्कान पर
लग  चुका  है  एक पहरा
तोड़  दो  अब  पहरे सारे
बंधन  सारे  ये  धुला   ले
थक चुका ...............

ढूंढ़ता  ही रहता हूँ हरदम
घर आने का  कोई बहाना
चाहता  रहता   हूँ अब तो
हरपल  तेरे ही पास आना
भेजो  बुलावा कोई जल्दी
कहीं  "संजू "तुझे भुला ले
थक चुका ....................

ए   मेरी  धरती , ए मेरे घर
अब   मुझको   तू  बुला ले
थक   चूका   हूँ बहुत अब
अपने   आँचल में सुला ले

Friday, October 30, 2015

हरपल  मुस्कराने  वाली
कभी  न  घबराने  वाली
दिखती नही चिंता कभी
रहे  सदा चेहरे पर लाली

था   अनजान   उससे  मैं
न  जाने कहाँ से वो आयी
नही था नाता कोई पुराना
पर दिलों दिमाग पर  छाई
भर  दिया  मन खुशियों से
जो था कब से  मेरा खाली
दिखता नही ..................

लिये  सात  फेरे  संग  मेरे
सब कुछ संग मिला लिया
जो थी चाहते,सपने अपने
सबको  उसने  भुला दिया
नही  छोड़ा सूखापन कहीं
कर दी चहुंओर  हरियाली
दिखती नही ................

सजती  है  वो  मेरे  लिये  ही
माँग  में सिंदूर भी सजाती है
नही  थकती   कभी  भी  वो
कुछ न कुछ करती  जाती है
खिलाती है भरपेट  सभी को
चाहेखाली रहे खुद की थाली
दिखती नही ...................

कैसे  बना  ये रिश्ता हमारा
कैसे ये हमारी हुई  पहचान
अनजाने  पंछी  दो ये ,कैसे
बन गये एक दूजे  की जान
चहुंओर   जीवन में प्रकाश
संजू बीत गयी  रात  काली
दिखती  नही  चिंता   कहीं
रहे  सदा  चेहरे   पर  लाली

हरपल  मुस्कराने  वाली
कभी  न  घबराने  वाली
दिखती  नही चिंता कहीं
रहे सदा चेहरे पर  लाली

Saturday, October 17, 2015

आने लगी है इक जानी पहचानी
खूशबू  अपने  गाँव  की  और से
            चल रहा है  पता  इस  बात  का
            हिलोरें खाती हुई हवा के शोर से
उमड़ने लगा है भूचाल  अंजाना
हर कोने में दिल के  चहुंओर  से
             मानो आ रहा है  याद  हमें  मेरा 
             गाँव और मेरा घर  बड़े जोर  से
होगी  खुशीहाली अब कुछ दिन
घर से   दूर  हो  चुके  थे  बोर से
             आज तो लग रहा है दिन  लम्बा
             शाम  का  इंतजार जो है भोर से
चल पड़ अब तू जल्दी सी गाड़ी
पहुँचा उस छोर तक इस छोर से
              कुछ ही दिन  की है  ये  खुशियाँ
              याद रखना संजू इसे बड़े गौर से

Tuesday, October 13, 2015

बनाना पड़ा साथी कागज कलम को
दुनियाँ में साथ मिलता है कहीं  कहीं

विश्वास  है  मुझे  इन   बेजुबानों  पर
देंगे   मुझे  धोखा  ये  कभी  भी  नही

नही  करते  ये तारीफ कभी भी झूठी
दिखाते  रहते  है हमें आईना ये  सही

लोग  है  इस दुनियाँ  के ये  बड़े  झूठे
कर देते झूठा  साबित हर खाता बही

करते  है  शैतानी  इतनी दिन  भर  ये
फैला  देते  रायता  ये बिखेर कर दही

टूटने लगे रिश्ते  नाते  दुनियादारी  के
वफादारी  की तो  उम्मीद भी ना रही

संजू "काट  ले तन्हाई तेरी संग कलम
बेजुवां  हो चाहे पर साथी है सच यहीं

एक रचना वरिष्ठ नागरिकों को समर्पित ........

साथ  छोड़ने  लगी  टहनियाँ
निकलने वाले है अब   प्राण
दूसरो  के  लिये  रहा  तैयार
रखूंगा  मरते दम तक  ध्यान

बाल रूपी पत्ते भी अब तो
एक  एक  कर  झड़ने लगे
बीमारियों  रूपी कीट अब
हजारों  ऊपर  चढ़ने   लगे
सुनने   लगा  है  कम  मुझे
सिकुड़ने लगे  है मेरे  कान
साथ छोड़ने ...............

हड्डियों  रूपी तना मेरा  ये
धीरे धीरे  सिकुड़ने लगा है
लताओं रूपी साथ सबका
धीरे धीरे ये  बिछुड़ने लगा
नही रुकेंगे रोकने से  अब
ये  जो रखते थे मेरा  मान
साथ छोड़ने .................

औलादों  रूपी  जडे  मेरी
न जाने कब  उखड़  जाये
जीवन रूपी खेल  मेरा  ये
न जानेे  कब  बिगड़ जाये
कट  चुकी  है  मिट्टी  सारी
पानी ने जड़ों को दिया छान
साथ छोड़ने ................

न रखना ध्यान  मेरा  चाहे
मिटने देना मेरी अब हस्ती
न देना चाहे सहारा "संजू "
डूबने देना मेरी  ये  कश्ती
पर फूटने देना अंकुर  मेरे
जो  बनेगी  मेरी   पहचान
साथ छोड़ने लगी टहनियाँ
निकलने वाले है अब प्राण
दूसरों के लिये  रहा  तैयार
रखूंगा मरते दम तक ध्यान

पहले  तोड़ी  साइकिल  हमने
फ़िर  आई  पहिये  की   बारी
रिम को लगाया छत पर और
पहिये  से  गलिया छान मारी

गाड़ी थी सबकी अपनी
सबका था अलग पहिया
लगता था ऐसे हम सबको
छान मारेंगे ये सारी दुनियाँ

न जाने  फट जाती शर्ट
न जाने कब फटती निक्कर
बन जाते बंदर हम सब
नही छोड़ते  पीपल कीकर

देख लिये नहा नहाकर
नदी नाले और तालाब सारे
उछलते -कूदते थे ऐसे हम
मानो छू लेंगे आसमां के तारे

हो जाते बेजुवां हम
जब आती स्कूल जाने की बारी
न बोले स्कूल जाने को कोई
चाहे चला दे हम पर आरी

अब जब वो दिन याद आते
आँखो में आँसु भर जाते
काश रबड़ का टायर लेकर "संजू "
फटी कच्छी वाले दोस्त फ़िर बुलाते

जिस देश का दिल है दिल्ली
और कश्मीर जिसका ताज है
जिसमे हो पाँच नदियों का पंजाब
उस भारतवर्ष पर हमें नाज़ हैं

हरा भरा हरियाणा जिसमे ,
राजवाडे राजस्थान के
मध्यप्रदेश सी शांति जिसमे
भंडार कर्नाटक में  खान के
बरसते मेघा मेघालय में और
उत्तर प्रदेश में भरपूर अनाज है
जिसमे हो पाँच ................

तिरुपति हैआंध्र में और
केरला में हरियाली है
उडिसा में जगन्नाथ बसे
बंगाल में माँ काली है
उतराखंड देवभूमि है तो
हिमाचल में हिम का ताज है
जिसमे हो पाँच .................

झारखंड और छतीसगढ़ तो
लाखों गुणों की खान है
गुजरात गाँधी, पटेल तो
बिहार बोध धर्म का स्थान हैं
असम,त्रिपुरा की बात निराली
नागालैंड शिक्षा का सरताज है
जिसमे हो पाँच .....................

तेलंगाना अभी बच्चा है
और गोवा सबसे छोटा है
श्रीलंका का गला तो अकेले
तमिलनाडु के मछुआरों ने घोटा है
करता स्वागत सूर्य देवता का वो
अरुणाचल सूर्य की पहली आवाज़ हैं
जिसमे हो पाँच ............

सिक्किम ओर मिजोरम तो
पहाड़ो की गोद में बसे हैं
मुगलों के नट बोल्ट तो
महाराष्ट्र के मराठों ने ही कसे हैं
शब्दों को बिना लय ताल जोड़ना
संजू किरमारा का अंदाज़ हैं
जिसमें हो पाँच नदियों का पंजाब
उस भारतवर्ष पर हमें नाज़ हैं

जिस देश का दिल है दिल्ली
और कश्मीर जिसका ताज है
जिसमे हो पाँच नदियों का पंजाब
उस भारतवर्ष पर हमें नाज़ हैं

जब तक पैदा करता हूँ अनाज
हर कोई करता मुझ  पर  नाज़
मेरे ही कारण करता था हमारा
ये  भारतवर्ष दुनियाँ  पर  राज़

पर नही  बरसते  ये बदरा अब
न जाने कितना सताएगा ये रब
सूखा ही  सूखा चहुंओर है,जाने
दिखेगा  पानी  इन खेतों में कब

ताल नदियाँ सब सूखने लगी हैं
ये साँस भी  अब रुकने लगी हैं
रहती  थी  गर्व से  ऊपर  गर्दन
वो शर्म हय से अब झुकने लगी

साहूकारों   का  सताया हुआ हूँ
दीमको  का  मैं खाया  हुआ  हूँ
चमक  नही रहती इस चेहरे पर
सूखी  आँधी से  नहाया हुआ हूँ

खाद   बीज  अब  मिलते  नही
फूल  खेतों में वो  खिलते  नही
कहाँ गये वो कोयल मोर पपीहे
साथी  मेरे  वो अब दिखते नही

थक चुका  हूँ  काम  कर करके
अपनी हार  अब  मैं मान  लूँगा
लगा  दो  "संजू"  सहारा  थोड़ा 
वर्ना लटककर पेड़ पर जान दूँगा

Monday, September 28, 2015

खुश हूं  मैं  या  उदास  ये देखने
मेरे आँसुओं पर  कभी  न जाना
क्यों भीगो देतेआँखें खुशी में भी
जान  न पाया अब तक  जमाना

न जाने कहाँ रहते हैं छिपे ये
बिन बुलाये  ही  आ जाते हैं
जाना चाहो दूर जीतना इनसे
उतना  ही पास इनको पाते हैं
कहाँ  है घर -परिवार  इनका,
नही मिला  अब तक ठिकाना
क्यों भीगो देते हैं  ..............

आ जाते  हैं ये  कभी -कभी
किसी  किसी  की  चाहत में
नही  रुकते  एक  पल भी ये
खुशी,सुकून,ग़म या राहत में
दर्दों से लगाव है इनका बड़ा
चाहे वो अपना हो या बेगाना
क्यों भीगो देते हैं ...............

देते रहते  हैं साथ सदा ये हमारा
आना हो किसी का या हो जुदाई
नही रोक  पाता इनको आने  से
मिलन हो किसी से या हो विदाई
मजे लेते रहते  हर माहौल के ये
करते दुखी ,कभी  करते सुहाना
क्यों भीगो देते हैं ..................

मंजिल  या मिलन  हो किसी का
आँखो को आकर ये  चूम लेते हैं
चाहे बिछुड़न हो किसी से तो भी
आँखो में  नाचकर झूम ही लेते हैं
मुश्किल हैं पार पाना इनसे "संजू "
चाहे ढूँढ़ ले  चाहे कोई भी बहाना
क्यों भीगो देते आँखें खुशी में भी
जान न पाया अब तक ये जमाना
खुश हूं  मैं या हूं  उदास  ये देखने
मेरे  आँसुओं पर  कभी  न  जाना