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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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यात्रा वृतांत :- मेसूर एक बार फ़िर कुछ भी लिखने से पहले मैं एक अनुभव सांझा करना चाहूंगा जो मैंने कई संगठनो में कार्य करते हुए महसुश किया है ...
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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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लड़ता रह राही तू ,इस उलझे हुए संसार में नही मिलने वाली कोई मंजिल एक बार में कश्ती है तेरी और तुझे ही चलानी ये अब नही तो दुनियाँ डुबो ...
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Tuesday, October 13, 2015
जब तक पैदा करता हूँ अनाज
हर कोई करता मुझ पर नाज़
मेरे ही कारण करता था हमारा
ये भारतवर्ष दुनियाँ पर राज़
पर नही बरसते ये बदरा अब
न जाने कितना सताएगा ये रब
सूखा ही सूखा चहुंओर है,जाने
दिखेगा पानी इन खेतों में कब
ताल नदियाँ सब सूखने लगी हैं
ये साँस भी अब रुकने लगी हैं
रहती थी गर्व से ऊपर गर्दन
वो शर्म हय से अब झुकने लगी
साहूकारों का सताया हुआ हूँ
दीमको का मैं खाया हुआ हूँ
चमक नही रहती इस चेहरे पर
सूखी आँधी से नहाया हुआ हूँ
खाद बीज अब मिलते नही
फूल खेतों में वो खिलते नही
कहाँ गये वो कोयल मोर पपीहे
साथी मेरे वो अब दिखते नही
थक चुका हूँ काम कर करके
अपनी हार अब मैं मान लूँगा
लगा दो "संजू" सहारा थोड़ा
वर्ना लटककर पेड़ पर जान दूँगा
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