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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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Thursday, December 17, 2015
हम तो ठहरे आज़ाद पंछी
पहुँच जायेंगे अपने आशियाने
यूँ ही शाम ढलते - ढलते
लक्ष्य ठहरा स्पष्ट हमारा
मिल जायेगी मंजिल हमें
यूँ ही यहाँ वहाँ चलते - चलते
कितनी टकरायेगी हमसे वो
थक जायेंगी सब मुश्किलें
राह में हमारे अड़ते - अड़ते
कितनी रोकेगी ये बाधायें
पार पा जायेंगे सबसे हम
बस यूँ ही हँसते - हँसते
मिलती है नाकामियां उन्हे
जो करते है हर काम
नाकामियों से डरते - डरते
नही है सहारे की कमी यहाँ
न जाने क्यों डरते है हम
विश्वास किसी पर करते - करते
थोड़ा सा क़दम बढ़ाओ
चलो मंजिल की और "संजू "
गले सबके यहाँ लगते - लगते
हम तो ठहरे आज़ाद पंछी
पहुँच जायेंगे अपने आशियाने
यूँ ही शाम ढलते - ढलते
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