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जीविका निर्वाह की व्यस्तता में हम कुछ इस तरह खो गये कि हम लौहडी और संक्राति जैसे त्योहारों को भूल गये नही याद आयी वो तिलों वाली रेबडिय़...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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वो सात दिन किसी कोने में है मेथ मेजिक तो किसी कोने में है लुकिंग अराउंड क्या उत्सव है आवडी में आज हर कोने से आ रहा है अजीब साउंड कुछ को...
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नेक राह चलना आसान नही थी राह इस दुनियादारी में कभी मिली है ये मंज़िल चलके कितने तूफानों पर खूब तपाया है इस लोहे को सोना बनाने को कैस...
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यात्रा वृतांत :- मेसूर एक बार फ़िर कुछ भी लिखने से पहले मैं एक अनुभव सांझा करना चाहूंगा जो मैंने कई संगठनो में कार्य करते हुए महसुश किया है ...
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लड़ता रह राही तू ,इस उलझे हुए संसार में नही मिलने वाली कोई मंजिल एक बार में कश्ती है तेरी और तुझे ही चलानी ये अब नही तो दुनियाँ डुबो ...
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Tuesday, October 13, 2015
बनाना पड़ा साथी कागज कलम को
दुनियाँ में साथ मिलता है कहीं कहीं
विश्वास है मुझे इन बेजुबानों पर
देंगे मुझे धोखा ये कभी भी नही
नही करते ये तारीफ कभी भी झूठी
दिखाते रहते है हमें आईना ये सही
लोग है इस दुनियाँ के ये बड़े झूठे
कर देते झूठा साबित हर खाता बही
करते है शैतानी इतनी दिन भर ये
फैला देते रायता ये बिखेर कर दही
टूटने लगे रिश्ते नाते दुनियादारी के
वफादारी की तो उम्मीद भी ना रही
संजू "काट ले तन्हाई तेरी संग कलम
बेजुवां हो चाहे पर साथी है सच यहीं
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