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जीविका निर्वाह की व्यस्तता में हम कुछ इस तरह खो गये कि हम लौहडी और संक्राति जैसे त्योहारों को भूल गये नही याद आयी वो तिलों वाली रेबडिय़...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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वो सात दिन किसी कोने में है मेथ मेजिक तो किसी कोने में है लुकिंग अराउंड क्या उत्सव है आवडी में आज हर कोने से आ रहा है अजीब साउंड कुछ को...
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नेक राह चलना आसान नही थी राह इस दुनियादारी में कभी मिली है ये मंज़िल चलके कितने तूफानों पर खूब तपाया है इस लोहे को सोना बनाने को कैस...
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यात्रा वृतांत :- मेसूर एक बार फ़िर कुछ भी लिखने से पहले मैं एक अनुभव सांझा करना चाहूंगा जो मैंने कई संगठनो में कार्य करते हुए महसुश किया है ...
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लड़ता रह राही तू ,इस उलझे हुए संसार में नही मिलने वाली कोई मंजिल एक बार में कश्ती है तेरी और तुझे ही चलानी ये अब नही तो दुनियाँ डुबो ...
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Thursday, December 17, 2015
बसने लगी बस्तियां अलग, सब साथ रह जाते
छोटी - मोटी मुशीबतों को,मिलकर हम सह जाते
चहुंओर फैलाकर भाईचारा,करते संग सब गुजारा
बन एक दूजे का प्यारा, प्रेम की दरिया में बह जाते
सब गले लगके मिलते, बगीचे के फूलों से खिलते
किसी के हिलाने से न हिलते, इकठ्ठे यहाँ रह जाते
मानवता का पाठ पढाके,नेक रास्ते सबको चलाके
दूसरों को अपने साथ चलाके,बढ़ने की कह जाते
नफ़रत को मिटाके,अज्ञानता का अँधेरा हटाके
शिक्षा की ज्योत ज़लाके,संजू अलग सतह पाते
बसने लगी बस्तियां अलग , सब साथ रह जाते
छोटी -मोटी मुशीबतों को,मिलकर हम सह जाते
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