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लड़ता रह राही तू ,इस उलझे हुए संसार में नही मिलने वाली कोई मंजिल एक बार में कश्ती है तेरी और तुझे ही चलानी ये अब नही तो दुनियाँ डुबो ...
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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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Saturday, October 17, 2015
आने लगी है इक जानी पहचानी
खूशबू अपने गाँव की और से
चल रहा है पता इस बात का
हिलोरें खाती हुई हवा के शोर से
उमड़ने लगा है भूचाल अंजाना
हर कोने में दिल के चहुंओर से
मानो आ रहा है याद हमें मेरा
गाँव और मेरा घर बड़े जोर से
होगी खुशीहाली अब कुछ दिन
घर से दूर हो चुके थे बोर से
आज तो लग रहा है दिन लम्बा
शाम का इंतजार जो है भोर से
चल पड़ अब तू जल्दी सी गाड़ी
पहुँचा उस छोर तक इस छोर से
कुछ ही दिन की है ये खुशियाँ
याद रखना संजू इसे बड़े गौर से
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