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जीविका निर्वाह की व्यस्तता में हम कुछ इस तरह खो गये कि हम लौहडी और संक्राति जैसे त्योहारों को भूल गये नही याद आयी वो तिलों वाली रेबडिय़...
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वो सात दिन किसी कोने में है मेथ मेजिक तो किसी कोने में है लुकिंग अराउंड क्या उत्सव है आवडी में आज हर कोने से आ रहा है अजीब साउंड कुछ को...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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नेक राह चलना आसान नही थी राह इस दुनियादारी में कभी मिली है ये मंज़िल चलके कितने तूफानों पर खूब तपाया है इस लोहे को सोना बनाने को कैस...
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यात्रा वृतांत :- मेसूर एक बार फ़िर कुछ भी लिखने से पहले मैं एक अनुभव सांझा करना चाहूंगा जो मैंने कई संगठनो में कार्य करते हुए महसुश किया है ...
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लड़ता रह राही तू ,इस उलझे हुए संसार में नही मिलने वाली कोई मंजिल एक बार में कश्ती है तेरी और तुझे ही चलानी ये अब नही तो दुनियाँ डुबो ...
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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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Saturday, November 21, 2015
सूखे पड़े रिश्तों के बगीचे
रंग बिरंगे फूल खिला दो
बनी है नफरत की दीवारें
सबको अब तुम मिटा दो
बुझती हुई आशाओं पर,
उम्मीद के दिये जला दो
न हो निराशा कहीं भी
आशा हर कोने में जगा दो
कुछ जलाओ अपने लिये
कुछऔरों के लियेजला दो
छोड़ो अँधेरे का दामन सब
प्रकाश हर तरफ़ फैला दो
बैरभाव दिल में न हो कहीं
भाईचारा चहुंओर फैला दो
त्यागो अँधेरी रात तुम अब
सूर्य की और क़दम बढा दो
त्याग दो सभी नाखूशी संजू
खुशियों के दीप अब जला दो
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