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नेक राह चलना आसान नही थी राह इस दुनियादारी में कभी मिली है ये मंज़िल चलके कितने तूफानों पर खूब तपाया है इस लोहे को सोना बनाने को कैस...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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छोड़ ख़ामोशी आज बोल ही पड़ा आखिर सूना पड़ा वो तालाब कहाँ रहते हो जनाब ? ? ? आते नही हो छलाँग लगाने कर के घरवालों से नये ...
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वो सात दिन किसी कोने में है मेथ मेजिक तो किसी कोने में है लुकिंग अराउंड क्या उत्सव है आवडी में आज हर कोने से आ रहा है अजीब साउंड कुछ को...
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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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Tuesday, October 13, 2015
पहले तोड़ी साइकिल हमने
फ़िर आई पहिये की बारी
रिम को लगाया छत पर और
पहिये से गलिया छान मारी
गाड़ी थी सबकी अपनी
सबका था अलग पहिया
लगता था ऐसे हम सबको
छान मारेंगे ये सारी दुनियाँ
न जाने फट जाती शर्ट
न जाने कब फटती निक्कर
बन जाते बंदर हम सब
नही छोड़ते पीपल कीकर
देख लिये नहा नहाकर
नदी नाले और तालाब सारे
उछलते -कूदते थे ऐसे हम
मानो छू लेंगे आसमां के तारे
हो जाते बेजुवां हम
जब आती स्कूल जाने की बारी
न बोले स्कूल जाने को कोई
चाहे चला दे हम पर आरी
अब जब वो दिन याद आते
आँखो में आँसु भर जाते
काश रबड़ का टायर लेकर "संजू "
फटी कच्छी वाले दोस्त फ़िर बुलाते
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