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चार कामों हम थोड़े क्या उलझ गये
तुम ही मुझको बेपरवाह समझ गये
तुम ही तो मेरे आदर्श और सहारा थे
फ़िर तुम्हारी नज़र में क्यों आवारा थे
तेरे सपनों के लिये हम दिनभर भागे थे
देने खुशियाँ सब तुम्हे रातों हम जागे थे
कुछ कम चीजों की तुमको चाहत थी
शायद इसी बात की थोड़ी राहत थी
पर हम तेरे लिये कुछ करना चाहते थे
इसलिये तो खुदको सदा ऐसा रखते थे
बस इन्ही चीजों की थोड़ी परेशानी थी
कामयाबी की रच रहे नई कहानी थी
माना हर बात हमको तुम्हे बतानी थी
पर किश्ती भीमंजिल तक पहुँचानी थी
पर शायद सोचता हूँ सब कुछ छोड़ दूँ
औरमुँह जिम्मेदारियों की और मोड़ लूँ
चाहूं आज मैं पास तेरे आना
दे दे किस्मत तू कोई बहाना
हर पल तू क्यों देती मुझको
दर्द जुदाई का इक अनजाना
कर यत्न तू अब मिलन का
छोड़ दे अब यूँ मुझे सताना
आज ज़रूरत है उसको मेरी
ज़रूरी है पास उसके जाना
जब मैं हूँ सबकुछ उसका
फ़िर क्यों बना दिया बेगाना
खास दिन है ये उसका आज
जो मुझे साथ उसके मनाना
ए हवा तू ही दे दे साथ आज
पहुँचा दे मेरा खास नजराना
स्वीकार करो शुभकामनाएँ
और देदो मुझको माफीनामा
जन्मदिवस मुबारक हो मेरे बिना
हमसे मिलने की हर वजहें तुम
यूँ किस्मत पर न सब छोड़ा करो
कभी मिलने की सोचकर क़दम
आशियाने की और भी मोड़ा करो
नही चाहते आना गर दर पे हमारे
रास्तों को यूँ बीच न छोड़ा करो
कभी आ जाना यूँ टहलते टहलते
हम नही कहते की तुम दौड़ा करो
बनाते है मुश्किल से घर यादों का
साफ मना कर उसे न फोड़ा करो
मानाआना सम्भव नही तुम्हारा पर
हमारे रस्ते में तो न कोई रोड़ा करो
बड़ी मिन्नतोंसे करते हो कोई वादा
अपने किये वादे को न तोड़ा करो
एक नये ठिकाने की ओर
उड़ ले पंछी अब तू
जितना नसीब था तेरा यहाँ
जितना वक्त था तेरा यहाँ
सब हुआ वो पूरा
रह गया हो चाहे
कोई काम तेरा अधूरा
तलाश कोई नया पेड़ अब तू
तलाश अब नया पेड़ अब तू
इस बगीचे में तो
कोई आकर बसेगा
सुनकर बाते तेरी कोई
तुझ पर खूब हँसेगा
पर क्या है उससे
फितरत है दुनियाँ की ये
जो गुण गाती है बस पास ही
पीछे से तोड़ती है ये विश्वास ही
पर घबराना मत तू कभी
तूने जो छोड़े है यहाँ निशाँ
वक्त लगेगा लोगों को
उनको बिल्कुल मिटाने में
जो मेहनत की थी तूने
उन निशानों को बनाने में
भूल जाना तू भी
इसको दूसरो की तरह
नये ठिकाने पर लग जाना
नए निशाने बनाने को
क्योंकि लोगों को जरूरत पड़ेगी
नए निशानों को मिटाने की
और कोई तो चीज रहनी चाहिये
तेरे जाने बाद मिटाने की
दिल में तो थी बहुत बातें उनके
पर न जाने क्यों वो बता ना सके
किस बात की परवाह थी उनको
जो प्यार हमसे वो जता ना सके
शायद ख़त्म करना चाहते थे दर्द
आगे चलकर जो हमें सता ना सके
जुदाई का डर था या बदनामी का
तभी कर कोई वो खता ना सके
मिल जाते किसी अनजाने मोड़ पे
ऐसा कोई वो हमें दे पता ना सके
दिल में तो थी बहुत बातें उनके
पर न जाने क्यों वो बता ना सके
मैं नही लिखता आजकल मेरी तन्हाई लिखती है
उसकी यादों के किस्से उसकी बेवफाई लिखती है
सोचता हूँ कड़वी घूँट पी जाऊँ उसकी यादों की
पर क्या करूँ यादों को उसकी रुसवाई लिखती है
कैसे कह दूँ हुआ हमारा कत्ल ए आम मुहब्बत में
मुहब्बत की हर बात प्यार में हुई लड़ाई लिखती है
अब भूल तो जाऊँ रोकर काटी उन तन्हा रातों को
उसकी खूबियाँ शाम उसके साथ बिताई लिखती है
ठान लेता न जाने कितनी बार उसको भूलने की
पर ये सब उसे न भूलने की कसमें खाई लिखती है
कई बार करता है मन तोड़ दूँ इस कलम को अब
कलम का क्या ?ये तो दिल में बात आई लिखती है
न जाने कितनी बार कोशिश की उससे दूर जाने की
पर उसकी हर दास्ताँ उसकी हुई विदाई लिखती है
संजय किरमारा ' उज्जवल '
6/2/18
छोड़ ख़ामोशी
