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जीविका निर्वाह की व्यस्तता में हम कुछ इस तरह खो गये कि हम लौहडी और संक्राति जैसे त्योहारों को भूल गये नही याद आयी वो तिलों वाली रेबडिय़...
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वो सात दिन किसी कोने में है मेथ मेजिक तो किसी कोने में है लुकिंग अराउंड क्या उत्सव है आवडी में आज हर कोने से आ रहा है अजीब साउंड कुछ को...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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नेक राह चलना आसान नही थी राह इस दुनियादारी में कभी मिली है ये मंज़िल चलके कितने तूफानों पर खूब तपाया है इस लोहे को सोना बनाने को कैस...
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यात्रा वृतांत :- मेसूर एक बार फ़िर कुछ भी लिखने से पहले मैं एक अनुभव सांझा करना चाहूंगा जो मैंने कई संगठनो में कार्य करते हुए महसुश किया है ...
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लड़ता रह राही तू ,इस उलझे हुए संसार में नही मिलने वाली कोई मंजिल एक बार में कश्ती है तेरी और तुझे ही चलानी ये अब नही तो दुनियाँ डुबो ...
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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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Monday, December 14, 2015
किसी उलझे लेखक की फरियाद कहानी
हुई बहुत तोड़ फोड़ कर आबाद कहानी
न जाने कितने लोगों का घर बसाकर ये
प्यार बढाकर हुई है खुद ईजाद कहानी
कितनों के सपनो को हवा में उड़ाकर
उनको करके आई है ऐसा बरबाद कहानी
दिल में बसे लोगों को दिल से भुलाकर
तब जाकर आई है सबको ये याद कहानी
कर जाती है घर दिलों में किसी के गर
कर देती है अरमानों को बरबाद कहानी
जिनका लहजा होता है गर सीधा साधा
उनके लिये होती है खुली किताब कहानी
देता है सजा वक्त ठोकर मार - मारकर
उनको तो रहती है हरदम याद कहानी
कितना वक्त का हँसाया / रूलाया होगा
"संजू " जिसने की है ये ईजाद कहानी
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