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Thursday, September 24, 2015

रहने लगा हूं खामोश मैं
आके मुझे दुलार दे
नही लगता मन अब मेरा
मुझे अब अपना प्यार दे
मँझदार में है नैया मेरी
इसे अब कर पार दे
लड़ूं मन की उलझनों से
ऐसा कोई हथियार दे
भटक जाता है मन कई बार
इसे थोड़ी डाँट फटकार दे
बैठ जाऊँ मैं शांति से
चाहे एक दो थप्पड़ ही मार दे
थक गया हूं काम करते करते
मुझे वो बचपन वाला रविवार दे
नही भाता खाना होटल का
अपने हाथो का मिर्ची अचार दे
लगा दो मुझे रास्ते पे फ़िर
चाहे सुना दो चार दे
बन गया हूं भटकता पंछी
बैठने को कोई आधार दे
खूब तोड़ मरोड़ लिया है अब
मुझे कोई स्थाई आकार दे
बहुत देख लिये सपने "संजू "
कर किसी एक को साकार दे

Tuesday, September 15, 2015

हिन्द देश है तन हमारा
हिन्दी हमारी जान है
इसी से धड़कता है ये दिल
इसी से हमारा मान है !

रखती है हमें बांधकर
एक सुगंधित माला में
सीखते हैं हम सब कुछ
इसी की पाठशाला में
बढ़ता इससे बहुत ज्ञान है
इसी से.. . . . . . . . . . . .

रहती खुद टूटती फूटती
पर सबको जोड़ जाती है
पूर्व - पश्चिम,उत्तर - दक्षिण
इसलिये सबको ये भाती है
लाखों गुणों की ये खान है
इसी से . . . . . . . . . . . .

आओ हम  सब मिलकर
कुछ इसका कर्ज चुकाए
करें समृद्ध इसे इतना
और अपना फर्ज चुकाए
जिससे भारतवर्ष  महान है
इसी से . . . . . . . . . . . .

नही होगा अकेले - अकेले
सबको मिलकर कुछ करना है
जोडो " संजू " साथ सबको
प्रचार - प्रसार इसका करना है
बढ़ाना इसका फ़िर से मान है
इसी से . . . . . . . . . . . . .  .

हिन्द देश हमारी पहचान है
हिन्दी हमारी जान है
इसी से धड़कता है ये दिल
इसी से हमारा मान है

Saturday, September 12, 2015

सीख लो दोस्तों मिलकर रहना,
है अनजान परदेश ये,
आज नही तो कल यहां से चले जाना है !

ख़ुदगर्ज है ज़माना ये,
यहां कैसे कैसे लोग आते है !
बताकर खुद को सूरज वो,
बादलों के पीछे छुप जाते है !
था हँसना साथ सबके पर
सीख लिया क्यों अकेले आँसू बहाना है !
है अनजान परदेश ये . . . . . .

सुनो ए भले इंसानों,
कभी इंसानियत का भी ख्याल करो !
आये हो बड़ी दूर से,
यहां सबका मान  सम्मान  करो !
क्यों सीख लिया है तुमने
निशाना किसी एक को बनाना है
है अनजान परदेश ये . . . . .

नही है घर यहां तुम्हारा,
है छोटा सा घर तुम्हे यहां सजाना !
सब है अपने ही यहां,
छोड़ दो तुम समझना सबको यहां बेगाना !
" संजू " क्यों सीख लिया है तुमने
किसी और का  मजाक बनाना है
है अनजान परदेश ये,
आज नही तो कल यहां से चले जाना है!

Monday, August 10, 2015

क्या है जिंदगी तू
क्या है तेरी कहानी
क्या है तेरा अपना
तू तो हरपल है बेगानी

क्यों हर कोई तुम्हे ही
पाने  की कोशिश करता है
संवारने के लिये तुम्हे
न जाने क्या क्या करता है
ढ़ूंढ़ते ढूंढते तुम्हे वो
कर देते है बर्बाद जवानी
क्या है तेरा अपना.......

तुझे चमकाने को लोगो को
कितनी मेहनत करनी पड़ती है
एक क़दम को रोकने
न जाने कितनी बाधायें अड़ती है
पर हमें तो  है तुझे पाने के
लिये नित चाल बढ़ानी
क्या है तेरा अपना.....

कितने निकलते है तुम्हे पाने
घर छोड़कर सफर में
नही पहुँच पाते बेचारे रह
जाते है बीच अधर में
रोक लेती है उन्हे किसी
अनजाने की नादानी
क्या है तेरा अपना....

रोक लेते है पहाड़,सागर,
जंगल और कलकलाती नदियाँ
तुम्हे पाने को बीत गयी
न जाने कितनी सदियाँ
पाकर छोडेगा तुम्हे अब ' राही '
चाहे बीत जाये जवानी
क्या है तेरा अपना....

क्या है जिंदगी तू
क्या है तेरी कहानी
क्या है तेरा अपना
तू तो हरपल है बेगानी

पुराने दोस्तो की याद मे और जीवन की व्यस्तता के बीच यार अनमुल्लो के लिये छोटा सा प्रयास 🙏🙏🙏

थक चुके  है अकेले बैठकर
क्यों न आज  पुराने दोस्तों के,
दरवाज़े खटखटाते हैं;

दिखता नही है कोई आजकल
देखते हैं उनके पँख थक चुके है,
या अभी भी फड़फड़ाते हैं;

रहते है परेशान हम,उनको देखते है
हँसते हैं खिलखिलाकर,
या होंठ बंद कर मुस्कुराते हैं;

उलझन भरी जिंदगी मे वो
बता देतें हैं सारी आपबीती,
या सिर्फ सक्सेस स्टोरी सुनाते हैं;

भूल गये है हमे या
हमारा चेहरा देख वो,
अपनेपन से मुस्कुराते हैं;

बैठते है वो चैन से साथ हमारे
या घड़ी की और देखकर,
हमें जाने का वक़्त बताते हैं ।

बन गये  है स्वार्थी है अकेले
रह - रहकर " संजू " क्यों न
आज फ़िर कुछ पुराने दोस्तों के,
दरवाज़े खटखटाते हैं...

तुम्हारे ख्वाबो  को हकीकत में,
मैं सजाना चाहता हूं ,
चलते रहना साथ हमारे,
तुम्हे जन्नत  दिखाना  चाहता हूं

बैठा के नजरो के सामने
जी भर देखना,
कभी नज़रे मिलाना कभी
नज़रे और नजारे चुराना चाहता हूं

खता हमसे होने पर
गर रूठ जाओ तुम
तो सुनाके प्यारी पंक्तियां
तुम्हे मनाना  चाहता हूं

बैठकर आमने सामने
किस्सा कोई प्रेम का
सुनने को तुमसे और
तुम्हे सुनाना  चाहता हूं

थी खताये और गलतफहमियां
हमारे बिच जितने भी"संजू " 
पास बैठकर उन
सबको भुलाना चाहता हूं

तुम्हारे ख्वाबों को हकीकत में,
मै सजाना चाहता हूं,
चलते रहना साथ हमारे,
तुम्हे जन्नत दिखाना चाहता हूं !

चाहता था रहना तन्हा मैं,
इसीलिये तो जाके दूर  सोया था
नही पसंद थी भीड़ दुनियादारी की,
मैं अपनी ही दुनिया मे खोया था

कोई करें समय खराब कीमती
इसलिये अकेला ही रहता था
जी ले  जिंदगी सबके संग,
वक्त ये ही सलाह देता था
खिसक गया वक्त और अपने
फ़िर  फूट फूट मैं रोया था
चाहता था रहना....

अनजाने में न जाने,
क्या क्या कर गया
कटनी थी जिंदगी जिन संग,
उन्ही को दुर मैं कर गया
काट रहा हूं फसल उन गमों की
जिनको हाथों से अपने बोया था
चाहता था रहना..

रहा भटकता दिन भरऔर न जाने
कितनी रातें काट दी जाग जागकर
खो बैठा एक एक कर सब अपने
काम काज  के पीछे भाग भागकर
कर दी कुर्बान जिंदगी सपनो पर
जिनको मैने दिल में संजोया था
चाहता था रहना....

बाकी बचा ही क्या है अब,
चल पड़ पंछी तू अपने घर
बड़ी बेदर्द  है  दुनिया ये,बचा ले
इससे अपनी आजादी और पर
भूल जा उन ख्यालों को ' संजू '
जिनमे तू रहता खोया था

चाहता था रहना तन्हा मैं
इसीलिये तो दुर जाके सोया था
नही पसंद थी भीड़ दुनियादारी की
तभी मैं अपनी ही दुनिया में खोया था