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जीविका निर्वाह की व्यस्तता में हम कुछ इस तरह खो गये कि हम लौहडी और संक्राति जैसे त्योहारों को भूल गये नही याद आयी वो तिलों वाली रेबडिय़...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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वो सात दिन किसी कोने में है मेथ मेजिक तो किसी कोने में है लुकिंग अराउंड क्या उत्सव है आवडी में आज हर कोने से आ रहा है अजीब साउंड कुछ को...
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नेक राह चलना आसान नही थी राह इस दुनियादारी में कभी मिली है ये मंज़िल चलके कितने तूफानों पर खूब तपाया है इस लोहे को सोना बनाने को कैस...
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यात्रा वृतांत :- मेसूर एक बार फ़िर कुछ भी लिखने से पहले मैं एक अनुभव सांझा करना चाहूंगा जो मैंने कई संगठनो में कार्य करते हुए महसुश किया है ...
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लड़ता रह राही तू ,इस उलझे हुए संसार में नही मिलने वाली कोई मंजिल एक बार में कश्ती है तेरी और तुझे ही चलानी ये अब नही तो दुनियाँ डुबो ...
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Wednesday, February 7, 2018
मैं नही लिखता आजकल मेरी तन्हाई लिखती है
उसकी यादों के किस्से उसकी बेवफाई लिखती है
सोचता हूँ कड़वी घूँट पी जाऊँ उसकी यादों की
पर क्या करूँ यादों को उसकी रुसवाई लिखती है
कैसे कह दूँ हुआ हमारा कत्ल ए आम मुहब्बत में
मुहब्बत की हर बात प्यार में हुई लड़ाई लिखती है
अब भूल तो जाऊँ रोकर काटी उन तन्हा रातों को
उसकी खूबियाँ शाम उसके साथ बिताई लिखती है
ठान लेता न जाने कितनी बार उसको भूलने की
पर ये सब उसे न भूलने की कसमें खाई लिखती है
कई बार करता है मन तोड़ दूँ इस कलम को अब
कलम का क्या ?ये तो दिल में बात आई लिखती है
न जाने कितनी बार कोशिश की उससे दूर जाने की
पर उसकी हर दास्ताँ उसकी हुई विदाई लिखती है
संजय किरमारा ' उज्जवल '
6/2/18
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