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जीविका निर्वाह की व्यस्तता में हम कुछ इस तरह खो गये कि हम लौहडी और संक्राति जैसे त्योहारों को भूल गये नही याद आयी वो तिलों वाली रेबडिय़...
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चार कामों हम थोड़े क्या उलझ गये तुम ही मुझको बेपरवाह समझ गये तुम ही तो मेरे आदर्श और सहारा थे फ़िर तुम्हारी नज़र में क्...
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छोड़ ख़ामोशी आज बोल ही पड़ा आखिर सूना पड़ा वो तालाब कहाँ रहते हो जनाब ? ? ? आते नही हो छलाँग लगाने कर के घरवालों से नये ...
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दिल में तो थी बहुत बातें उनके पर न जाने क्यों वो बता ना सके किस बात की परवाह थी उनको जो प्यार हमसे वो जता ना सके शायद ख़त...
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अपना ग्रुप कौन रहेगा किस समूह में सब मन ही मन में रट रहे थे थे सब बैचेन यहाँ क्योंकि सब चार ग्रूप्स में बँट रहे थे किसको पता था कि इं...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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वो सात दिन किसी कोने में है मेथ मेजिक तो किसी कोने में है लुकिंग अराउंड क्या उत्सव है आवडी में आज हर कोने से आ रहा है अजीब साउंड कुछ को...
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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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यात्रा वृतांत :- मेसूर एक बार फ़िर कुछ भी लिखने से पहले मैं एक अनुभव सांझा करना चाहूंगा जो मैंने कई संगठनो में कार्य करते हुए महसुश किया है ...
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Wednesday, March 30, 2016
नेक राह चलना
आसान नही थी राह इस दुनियादारी में कभी
मिली है ये मंज़िल चलके कितने तूफानों पर
खूब तपाया है इस लोहे को सोना बनाने को
कैसे बेच दूं अब इसे मैं मिट्टी की दुकानों पर
जलाया है इसे सच्चाई की भट्टी में बहुत
कैसे सौदा कर दूं इसका झूठ के फ़सानों पर
बनाना पड़ा था भीष्म खुद को इसके लिये
सुलाना पड़ा था खुद को अर्जुन के बाणों पर
अथक प्रयास कर बनाया सफलता का पर्वत
अब कैसे बहाऊं मिट्टी सा नदी के मुहानों पर
प्यार,प्रेम, भाईचारा ,सौहार्द कितना फैलाया
अब कैसे कुर्बान कर दूं नफ़रत के गानों पर
माना मरता जा रहा इंसान और इंसानियत
चमक रहा है झूठ और फरेब आसमानों पर
चमकते रहना कामयाबी की राह पर उज्ज्वल
न आना कभी तू झूठ फरेबो के निशानों पर
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