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लड़ता रह राही तू ,इस उलझे हुए संसार में नही मिलने वाली कोई मंजिल एक बार में कश्ती है तेरी और तुझे ही चलानी ये अब नही तो दुनियाँ डुबो ...
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Wednesday, March 30, 2016
नेक राह चलना
आसान नही थी राह इस दुनियादारी में कभी
मिली है ये मंज़िल चलके कितने तूफानों पर
खूब तपाया है इस लोहे को सोना बनाने को
कैसे बेच दूं अब इसे मैं मिट्टी की दुकानों पर
जलाया है इसे सच्चाई की भट्टी में बहुत
कैसे सौदा कर दूं इसका झूठ के फ़सानों पर
बनाना पड़ा था भीष्म खुद को इसके लिये
सुलाना पड़ा था खुद को अर्जुन के बाणों पर
अथक प्रयास कर बनाया सफलता का पर्वत
अब कैसे बहाऊं मिट्टी सा नदी के मुहानों पर
प्यार,प्रेम, भाईचारा ,सौहार्द कितना फैलाया
अब कैसे कुर्बान कर दूं नफ़रत के गानों पर
माना मरता जा रहा इंसान और इंसानियत
चमक रहा है झूठ और फरेब आसमानों पर
चमकते रहना कामयाबी की राह पर उज्ज्वल
न आना कभी तू झूठ फरेबो के निशानों पर
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