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जीविका निर्वाह की व्यस्तता में हम कुछ इस तरह खो गये कि हम लौहडी और संक्राति जैसे त्योहारों को भूल गये नही याद आयी वो तिलों वाली रेबडिय़...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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वो सात दिन किसी कोने में है मेथ मेजिक तो किसी कोने में है लुकिंग अराउंड क्या उत्सव है आवडी में आज हर कोने से आ रहा है अजीब साउंड कुछ को...
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नेक राह चलना आसान नही थी राह इस दुनियादारी में कभी मिली है ये मंज़िल चलके कितने तूफानों पर खूब तपाया है इस लोहे को सोना बनाने को कैस...
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यात्रा वृतांत :- मेसूर एक बार फ़िर कुछ भी लिखने से पहले मैं एक अनुभव सांझा करना चाहूंगा जो मैंने कई संगठनो में कार्य करते हुए महसुश किया है ...
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लड़ता रह राही तू ,इस उलझे हुए संसार में नही मिलने वाली कोई मंजिल एक बार में कश्ती है तेरी और तुझे ही चलानी ये अब नही तो दुनियाँ डुबो ...
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Saturday, September 12, 2015
सीख लो दोस्तों मिलकर रहना,
है अनजान परदेश ये,
आज नही तो कल यहां से चले जाना है !
ख़ुदगर्ज है ज़माना ये,
यहां कैसे कैसे लोग आते है !
बताकर खुद को सूरज वो,
बादलों के पीछे छुप जाते है !
था हँसना साथ सबके पर
सीख लिया क्यों अकेले आँसू बहाना है !
है अनजान परदेश ये . . . . . .
सुनो ए भले इंसानों,
कभी इंसानियत का भी ख्याल करो !
आये हो बड़ी दूर से,
यहां सबका मान सम्मान करो !
क्यों सीख लिया है तुमने
निशाना किसी एक को बनाना है
है अनजान परदेश ये . . . . .
नही है घर यहां तुम्हारा,
है छोटा सा घर तुम्हे यहां सजाना !
सब है अपने ही यहां,
छोड़ दो तुम समझना सबको यहां बेगाना !
" संजू " क्यों सीख लिया है तुमने
किसी और का मजाक बनाना है
है अनजान परदेश ये,
आज नही तो कल यहां से चले जाना है!
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