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लड़ता रह राही तू ,इस उलझे हुए संसार में नही मिलने वाली कोई मंजिल एक बार में कश्ती है तेरी और तुझे ही चलानी ये अब नही तो दुनियाँ डुबो ...
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Friday, July 10, 2026
कशमश है उँगलियों में
आज फ़िर से ये उँगलियाँ
जाने क्यों कशमशा रही है
चाहती है कुछ लिखना शायद
मन ही मन कुछ ये गा रही है
फूटेंगी ये आज
ज़रूर को रचना बनकर
लिखेंगी कुछ ये पक्का
खुद ही आगे बढ़कर
पड़ा मेज के कोने पे
सफेद पन्ना भी आज तो
यूँ ही फ़ड़फ़ड़ा रहा है
चलाने खुद पर कलम
कब से ये अड़ा जा रहा है
मन में भी अलग ही
उथल पुथल मची है
कुछ होगा नया आज
ये बात तो मन में जंची है
सुबह से ये दिल भी
यूही भटक रहा है
कुछ न कुछ आज तो
पक्का खटक रहा है
बन जायेगा संगम जब
इन सब चीजों का गर
होगा शब्दों का मेल और
दिखेगा सबका असर
शायद वीरां प्रदेश में
कोई बगिया खिलने वाली है
बनाकर कोई रस्ता
चीर कर पहाडों को
कोई नदी निकलने वाली है
शब्दों के मेल से कोई नई
"संजू" लय मिलने वाली है
इस उथल पुथल में से
कोई रचना निकलने वाली है
Labels:
कविता,
कशमकश,
दिल,
हलचल
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