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Wednesday, March 30, 2016
कितना अजीब दस्तूर है
इस दुनियादारी का
हम जिसे
पढ़ते,
समझते
और सुनते रहे
कि ये दुनियाँ गोल हैं !
हमने गुजार दी
आधी जिंदगी सिर्फ
दूसरों की कमियां निकालने में,
दूसरों की बुराइयां गिनाने में,
और दूसरों को सताने में
लगे रहे दूसरों को
दोस्त देने में
सारी शाबासी खुद लेने में
पर ये क्या
सब झूठ निकला,
निकला एक कागजी अफ़साना
देखा उसे जब
दिल खोल के,
कुछ सच्चाई बोल के,
अपने गुणों अवगुणो को तौल के
तब जाके,
यह महसूस हुआ कि
ये दुनियाँ गोल ही नही
बल्कि अच्छी भी है
और बहुत खूबसूरत भी है
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