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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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दिल में तो थी बहुत बातें उनके पर न जाने क्यों वो बता ना सके किस बात की परवाह थी उनको जो प्यार हमसे वो जता ना सके शायद ख़त...
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यात्रा वृतांत :- मेसूर एक बार फ़िर कुछ भी लिखने से पहले मैं एक अनुभव सांझा करना चाहूंगा जो मैंने कई संगठनो में कार्य करते हुए महसुश किया है ...
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यात्रा वृतांत :- मेसूर एक बार फ़िर कुछ भी लिखने से पहले मैं एक अनुभव सांझा करना चाहूंगा जो मैंने कई संगठनो में कार्य करते हुए महसुश किया है ...
यात्रा वृतांत :- त्रिवेन्द्रम
दिनांक 12-3-16 , 13-03-16
लिखा है किताबों में कश्मीर के बारे में कि,
धरती पर स्वर्ग यदि कहीँ है
तो वह यहीं है यहीं है
पर मेरे विचार से,
स्वर्ग तो शायद वहीँ है
पर देवता तुल्य इंसान बसते और कहीँ है !
जी हाँ ये वो बातें है जो मैंने अपनी त्रिवेन्द्रम यात्रा पर महसुस की ! कई दिन से लगातार बुलावे आ रहे थे यहाँ की यात्रा करने के लिये मेरे मित्रों मनदीप और अनूप के ! और अंत में भगवान ने मुझे ये मौका भी दे दिया ! और मैं सवार हो गया बस में त्रिवेन्द्रम के लिये ! बस कानो में ये शब्द गूँज रहे थे -
जो लगातार फोन पर सुनते थे
" अरे क्या हाल है किरमारा ?"
"आने का क्या हुआ ?"
"कब आ रहा है भाई ?"
ये शब्द थे हमारे प्रिय कवि मित्र अनूप भारतीय के !
इसके बाद दूसरे शब्द -
"राम -राम मास्टर जी "
" आन की कहवे था, के होया ?"
"आजै यार "
ये शब्द थे मेरे भाई मंदीप के जो सी आई एस एफ़
में कार्यरत है !
इन्ही शब्दों के सहारे सफर सुहाना कट रहा था और कल्पनाएं चरम पर थी !
कैसा होगा वो स्थान ?
कैसा है कोवलम बीच ?
क्या है पद्मनाभ मंदिर में ?
और भी न जाने क्या क्या ?
सुबह बस आठ बजे त्रिवेन्द्रम पहुँचने वाली थी और मैं सो रहा था हसीन सपनो में !
साढ़े पाँच अचानक फोन बजा !देखा तो मंदीप का फोन था ! वो ही प्रश्न 😆
कितने बजे पहुँच रहा है ?
मंदीप से बात ख़त्म ही ना हुई कि अनूप का फोन आ गया !
भाई पल्लीपुरम उतर जाना ! नहा लेना फ़िर चलेंगे !और अनूप ने पल्लीपुरम ही उतार लिया !
अरे ये क्या ?
इतना हँसता खेलता परिवार ?
अनूप ने भी क्या दुनियाँ बसाई है ?
घर से हजारों किलोमीटर दूर ?
एक बहुत ही ही शानदार परिवार जिस्में अनूप भाई ,राजेंद्र भाई,मास्टर जी, कपिल भाई और एक वैज्ञानिक का परिवार और उनकी प्यारी सी सृष्टि जिसको देखने मात्र से सारी थकान दूर हो जाए ! सबका एक दूजे के प्रति इतना प्रेम ! अवर्णनीय ?
सभी बेडमिन्टन खेलने चले गये! तब तक मैं नहा धोकर फ़िर से तरोताजा हो गया ! खेलने के बाद हम सब नाश्ते के लिये द आर्याज होटल गये और हमारा नाश्ता किया !
और उसके बाद शुरू हो गया जिंदगी का एक और अविस्मरणीय दिन जो अनूप और मंदीप ने बनाया !
मैं और अनूप दुपहिया वाहन से पद्मनाथ मंदिर गये, तब तक मंदीप भी वहाँ पहुँच गया ! हमने मंदिर में भगवान के दर्शन किये और कोवलम बीच के लिये रवाना हो गये !
कितना सुंदर समुन्द्रतट !
देखते ही देखते हम तीनों पानी में उतर गये और लगभग दो तीन घंटे तक मस्ती करते रहे ! और काफ़ी फोटो लिये !
फ़िर हम तीनों वहाँ से CISF केम्पस की और चल पड़े जहाँ मंदीप ने दोपहर के खाने की बहूत ही सुंदर व्यवस्था कर रखी थी ! नहाने के बाद में हमने खाना खाया और एक घंटे आराम किया और मंदीप के साथ बचपन की यादें ताजा की ! घर का बना गोंद खाके और मंदीप के द्वारा बनाया केले का जूस पीकर पेट लगभग फटने वाला ही था ! शाम चार बजे मंदीप से वहाँ से निकलने की अनुमति ली जो काफ़ी मिन्नतों के बाद मिली !
उसके बाद बिग बाजार से कुछ खरीददारी की और वापिस पल्लीपुरम आ गये ! यहाँ पहुँचकर कुछ देर आराम किया और फ़िर शुरू हो गयी काव्यशाला जो की लगभग दो घंटे तक चली तक तक खाना तैयार हो गया और सबने खाना खाया ! रात बारह एक बजे तक बातें चलती रही और फ़िर सो गये ! और एक मनमोहक चीज़ राजेंद्र भाई की बनाई हुई चाय !तेरह तारीख को शाम को वापिस लौटना इसलिए हमने आराम ही किया !
और अंत में वो समय आ ही गया जब सबको अलविदा कहना था !शाम चार बजे मैं वहाँ से निकल पड़ा ! सच में ये एक बहुत ही अकल्पनीय यात्रा थी जो अनूप, मंदीप और उनके मित्रों "जो अब मेरे मित्र भी है " ने मिलकर मेरी इस यात्रा को अवर्णनीय, अविश्वसनीय और अतुलनीय बना दिया ! तो धन्यवाद मित्रों अब कलम को यहीं रोकता हूँ क्योंकि इस पूरी यात्रा के उल्लास, खुशी का वर्णन तो शायद वेदव्यास भी न कर पाये!

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