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जीविका निर्वाह की व्यस्तता में हम कुछ इस तरह खो गये कि हम लौहडी और संक्राति जैसे त्योहारों को भूल गये नही याद आयी वो तिलों वाली रेबडिय़...
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चार कामों हम थोड़े क्या उलझ गये तुम ही मुझको बेपरवाह समझ गये तुम ही तो मेरे आदर्श और सहारा थे फ़िर तुम्हारी नज़र में क्...
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छोड़ ख़ामोशी आज बोल ही पड़ा आखिर सूना पड़ा वो तालाब कहाँ रहते हो जनाब ? ? ? आते नही हो छलाँग लगाने कर के घरवालों से नये ...
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दिल में तो थी बहुत बातें उनके पर न जाने क्यों वो बता ना सके किस बात की परवाह थी उनको जो प्यार हमसे वो जता ना सके शायद ख़त...
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अपना ग्रुप कौन रहेगा किस समूह में सब मन ही मन में रट रहे थे थे सब बैचेन यहाँ क्योंकि सब चार ग्रूप्स में बँट रहे थे किसको पता था कि इं...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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हमसे मिलने की हर वजहें तुम यूँ किस्मत पर न सब छोड़ा करो कभी मिलने की सोचकर क़दम आशियाने की और भी मोड़ा करो नही चाहते आना गर दर प...
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जिंदगी तो है इक खेल निराला अब ये खेल तो हमें खेलना है माना कठिन समय आजकल पर आगे तो इसको धकेलना है पल पल क्यों बदलता रहता है बिन मत...
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टेंशन छोड़ो और जिंदगी के सबसे बड़े परिवर्तन का मजा लो
दोस्तों इस फैँसले से फायदा होगा या नुकसान ये तो भविष्य के गर्भ में है । लेकिन मैं इसे स्वीकार करता हूँ और इसका स्वागत करता हूँ ।हमें नोटबंदी से कोई समस्या नही । आज लाइन में लगे तो पाँच छह घंटे नम्बर नही आया तो बिल्कुल भी दुःख नही हुआ । क्योंकि ये मेरे लिये कोई नई चीज़ नही है ,हम भारतीयों का तो जन्म ही लाइन में लगने के लिये होता है ।
सबसे पहले जब बचपन के दिनो को याद करता हूँ तो याद आता है कि सस्ते राशन के लिये भी लाइन में लगता था ।
उसके बाद हॉस्पिटल याद आता है जहाँ बीमार लोग भी चार पाँच घंटे आराम से लाइन में गुजार लेते है
फ़िर याद आता है सहकारी समिति का वो दृश्य जहाँ एक हरा थका किसान भी पाँच छह घंटे खाद बीज के लिये गुजारता रहा है जबकि अनेकों बार तो उसका नम्बर आने से पहले ही स्टाक ख़त्म हो जाता है ।
फ़िर याद आते है पढाई के वो दिन जब साला एक भी सर्टिफिकेट तीन चार घंटे लाइन में लगे बिना नही बना चाहे वो जन्म प्रमाण पत्र हो या रिहायशी प्रमाण पत्र । तब तो हमें कभी भी कुछ गलत नही लगा ।
फ़िर याद करता हूँ जॉब के लिये दिये गये साक्षात्कार - ऐसा शायद ही कोई इंटरव्यू हुआ होगा जिसमे पाँच छह घंटे से पहले नम्बर आया हो ,इसलिये मुझे कुछ भी नया नही लगा ।
फ़िर आते है याद वो सारे धार्मिक सफर जो जिंदगी में कुछ अच्छा पाने के लिये किये थे चाहे वो शिरडी हो , तिरुपति हो या वैष्णो देवी कभी भी पाँच सात घंटे की लाइन बिना नम्बर नही आया तो आज मैं उदास क्यों ?
रेलवे टिकट के लिये भी घंटा दो घंटा खड़ा होना पड़ जाता है तो इस लाइन में नया क्या है ?
और अब याद करता हूँ ताजा हादसा जो jio सिम के लिये हुआ घंटों लाइन में लगते थे और कई बार तो अपना नम्बर आने से पहले ही सिम ख़त्म ?
जब हम बचपन से ही लाइन में लगते आये है तो इतना हंगामा क्यों ? दोस्तो हमें घबराने की कोई ज़रूरत नही है हमारा तो जन्म ही ऐसी मातृभूमि पर हुआ जहाँ बड़ी से बड़ी मुसीबतों को लोग हँसते हँसते सह लेते है तो ये तो समस्या ही क्या है ? इस समस्या को त्योहार की तरह मनाये और आनँद ले ।
सहमत है ?
किसी को ठेस पहुँची हो तो अग्रिम क्षमा
संजय किरमारा "उज्ज्वल "
