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जीविका निर्वाह की व्यस्तता में हम कुछ इस तरह खो गये कि हम लौहडी और संक्राति जैसे त्योहारों को भूल गये नही याद आयी वो तिलों वाली रेबडिय़...
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चार कामों हम थोड़े क्या उलझ गये तुम ही मुझको बेपरवाह समझ गये तुम ही तो मेरे आदर्श और सहारा थे फ़िर तुम्हारी नज़र में क्...
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छोड़ ख़ामोशी आज बोल ही पड़ा आखिर सूना पड़ा वो तालाब कहाँ रहते हो जनाब ? ? ? आते नही हो छलाँग लगाने कर के घरवालों से नये ...
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दिल में तो थी बहुत बातें उनके पर न जाने क्यों वो बता ना सके किस बात की परवाह थी उनको जो प्यार हमसे वो जता ना सके शायद ख़त...
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अपना ग्रुप कौन रहेगा किस समूह में सब मन ही मन में रट रहे थे थे सब बैचेन यहाँ क्योंकि सब चार ग्रूप्स में बँट रहे थे किसको पता था कि इं...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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हमसे मिलने की हर वजहें तुम यूँ किस्मत पर न सब छोड़ा करो कभी मिलने की सोचकर क़दम आशियाने की और भी मोड़ा करो नही चाहते आना गर दर प...
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जिंदगी तो है इक खेल निराला अब ये खेल तो हमें खेलना है माना कठिन समय आजकल पर आगे तो इसको धकेलना है पल पल क्यों बदलता रहता है बिन मत...
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रंग बिरंगे नोट
नज़र पड़ती है जब भी
बाजार में चल रहे
रंग बिरंगे नोटो पर
या फ़िर नज़र पड़ती है
अलग अलग सिक्कों पर
तब मन में
सिर्फ एक सवाल उठता है
कि कैसा रुप है
या कैसा रंग है
इस बाजार का
जो हर पल एक अलग रंग
या अलग चेहरे के साथ
नज़र आता है
या फ़िर उठता है सवाल मन में
मनुष्यों की जरूरतें बिकती हैं
न जाने कितने चेहरों से
या फ़िर बिक जाते हैं भगवान खुद
या हमारे महापुरुष बिक जाते हैं
किसी न किसी नोट या
सिक्के पर छपकर
सिर्फ मनुष्य की ज़रूरत पूरा करने
पर अंत में दिखते हैं जब
धुंधले पड़े नोटो पर
महापुरुषों के चेहरे या
किन्हीं घिसे सिक्कों पर
महात्माओं या देवी देवताओं के चेहरे
तब उठते हैं सवाल मन में लाखों
झंझोड़ कर रख देते हैं मन को
कि जब घिस गये महापुरुष और सिक्के
और धुंधले पड़ गये महात्मा
ज़रूरत पूरा करते - करते
इस दुनियादारी की
तो क्या औकात हैं "उज्ज्वल "तेरी
जो तू कर पायें जरूरतें पूरी
किसी की इस दुनियादारी में
संजय किरमारा "उज्ज्वल "
