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जीविका निर्वाह की व्यस्तता में हम कुछ इस तरह खो गये कि हम लौहडी और संक्राति जैसे त्योहारों को भूल गये नही याद आयी वो तिलों वाली रेबडिय़...
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चार कामों हम थोड़े क्या उलझ गये तुम ही मुझको बेपरवाह समझ गये तुम ही तो मेरे आदर्श और सहारा थे फ़िर तुम्हारी नज़र में क्...
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छोड़ ख़ामोशी आज बोल ही पड़ा आखिर सूना पड़ा वो तालाब कहाँ रहते हो जनाब ? ? ? आते नही हो छलाँग लगाने कर के घरवालों से नये ...
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दिल में तो थी बहुत बातें उनके पर न जाने क्यों वो बता ना सके किस बात की परवाह थी उनको जो प्यार हमसे वो जता ना सके शायद ख़त...
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अपना ग्रुप कौन रहेगा किस समूह में सब मन ही मन में रट रहे थे थे सब बैचेन यहाँ क्योंकि सब चार ग्रूप्स में बँट रहे थे किसको पता था कि इं...
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गुमनाम चेहरा गुमनाम सा चेहरा हूँ अभी तक यहाँ तभी तो किसी को भी मैं न दिखता हूँ नादां सा हूँ इस दुनियाँ में अभी तक तभी तो किसी ...
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हर रोज़ दुनियाँ बदलने की सोच लेता हूँ मैं पर अब तक क्यों खुद को न बदल पाया हूँ बन चुका हूँ कितना नादां मैं ,किसको बदलू रोशनी है दु...
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हमसे मिलने की हर वजहें तुम यूँ किस्मत पर न सब छोड़ा करो कभी मिलने की सोचकर क़दम आशियाने की और भी मोड़ा करो नही चाहते आना गर दर प...
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जिंदगी तो है इक खेल निराला अब ये खेल तो हमें खेलना है माना कठिन समय आजकल पर आगे तो इसको धकेलना है पल पल क्यों बदलता रहता है बिन मत...
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लेडी फिंगर
एक अध्यापक के मन में
एक दिन हरी सब्जी
खाने का ख्याल आया
तो उसने कक्षा में से
एक कमजोर से बच्चे को बुलाया
हुआ कुछ यूँ
अध्यापक बेचारा
इंग्लिश मीडियम ही पढ़ा था
उस पर तो सिर्फ
अँग्रेजी का भूत चढ़ा था
बच्चा बेचारा
कोई गाँव से पढ़ने आता था
इसलिये ही शायद वो
अँग्रेजी नही समझ पाता था
उसने जेब से पचास का
एक नोट निकाला और
बच्चे को लेडी फिंगर लेने
बाजार भेज डाला
बच्चा इंग्लिश समझ न पाया
कोशिश की तो
समझ में लेडी फिंगर का अर्थ
महिला की उँगली आया
नादान था बच्चा बेचारा
उसने जाते ही सब्जी बेचने वाली को
पचास का नोट पकड़ा दिया
और अध्यापक बुला रहे है उसे
ये संदेश सब्जी वाली को बता दिया
होना क्या था फ़िर दोस्तों
उँगली पकड़ सब्जी वाली को
स्कूल ले आया
और उस औरत और उसके पति से
अध्यापक को खूब पिटवाया
अब समझ आया संजू कि
आधुनिकीकरण के चक्कर में
हम किस तरह खोते जा रहे है
और भिंडी की जगह
सब्जी वाली के हाथो
पिटते ही जा रहे है
